ज्वालामुखी शक्तिपीठ || Jwalamukhi Shakti Peeth
कहाँ स्थित है
हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है
यह शक्तिपीठ, जहां सती का जिह्वा गिरी थी। अपनी दिव्यता के लिये ज्वालामुखी शक्तिपीठ प्रसिद्ध
है, जो हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिला में स्थित है। 'ज्वाला देवी' या 'ज्वालामुखी' शक्तिपीठ। यहाँ
सती की 'जिह्वा का निपात' हुआ था तथा जहाँ मंदिर में कोई प्रतिमा नहीं है, वरन् वहाँ माँ प्रज्जवलित प्रस्फुटित होती हैं। यहाँ की शक्ति 'सिद्धिदा' व भैरव 'उन्मत्त' हैं। यहाँ पर
मंदिर के अंदर कुल 10 ज्योतियाँ निकलती हैं- दीवार के गोखले से 4, मध्य कुण्ड की भित्ति से 4 दाहिनी दीवार से एक तथा कोने से एक।
पौराणिक कथा
प्राचीन किंवदंतियों में ऐसे समय की बात
आती है जब राक्षस हिमालय के पहाड़ों पर प्रभुत्व जमाते थे और देवताओं को परेशान
करते थे। भगवान विष्णु के नेतृत्व में, देवताओं ने उन्हें नष्ट करने का फैसला
किया। उन्होंने अपनी ताकत पर ध्यान केंद्रित किया और विशाल लपटें जमीन से उठ गईं।
उस आग से एक छोटी बच्ची ने जन्म लिया। उसे आदिशक्ति-प्रथम 'शक्ति' माना जाता है।
सती के रूप में जानी जाने वाली, वह प्रजापति दक्ष के घर में पली-बढ़ी और बाद में, भगवान शिव की पत्नी बन गई। एक बार उसके पिता ने भगवान शिव का अपमान किया
सती को यह स्वीकार ना होने के कारण, उसने खुद को हवन कुंड मे भस्म कर डाला।
जब भगवान शिव ने अपनी पत्नी की मृत्यु के बारे में सुना तो उनके गुस्से का कोई
ठिकाना नहीं रहा और उन्होंने सती के शरीर को पकड़कर तीनों लोकों मे भ्रमण करना
शुरू किया। अन्य देवता शिव के क्रोध के आगे कांप उठे और भगवान विष्णु से मदद
मांगी। भगवान विष्णु ने सती के शरीर को चक्र के वार से खंडित कर दिया। जिन स्थानों
पर ये टुकड़े गिरे, उन स्थानों पर इक्यावन पवित्र 'शक्तिपीठ' अस्तित्व में आए। "सती की जीभ ज्वालाजी (610 मीटर) पर गिरी थी और देवी छोटी लपटों के रूप में प्रकट हुई। ऐसा कहा जाता
है कि सदियों पहले, एक चरवाहे ने देखा कि अमुक पर्वत से ज्वाला निकल रही है और उसके बारे मे
राजा भूमिचंद को बताया। राजा को इस बात की जानकारी थी कि इस क्षेत्र में सती की
जीभ गिरी थी। राजा ने वहाँ भगवती का मंदिर बनवा दिया
ज्वालामुखी युगों से एक तीर्थस्थल है।
मुगल बादशाह अकबर ने एक बार आग की लपटों को एक लोहे की चादर से ढँकने का प्रयास
किया और यहाँ तक कि उन्हें पानी से भी बुझाना चाहा। लेकिन ज्वाला की लपटों ने इन
सभी प्रयासों को विफल कर दिया। तब अकबर ने तीर्थस्थल पर एक स्वर्ण छत्र भेंट किया और
क्षमा याचना की। हालाँकि, देवी की सामने अभिमान भरे वचन बोलने के कारण देवी ने सोने के छत्र को एक
विचित्र धातु में तब्दील कर दिया, जो अभी भी अज्ञात है। इस घटना के बाद
देवी में उनका विश्वास और अधिक मजबूत हुआ। आध्यात्मिक शांति के लिए हजारों
तीर्थयात्री साल भर तीर्थ यात्रा पर जाते हैं।
ज्वालामुखी शक्तिपीठ विश्व में पहला ऐसा
मंदिर है, जहां प्रतिमा की पूजा नहीं होती। मंदिर में सात ज्योतियां अनादिकाल से
विराजमान हैं। मंदिर में श्रद्धालु इन ज्योतियों की ही पूजा करते हैं। यही नहीं
मंदिर के बारे में एक और अनोखी बात यह भी है कि यहां रोजाना पांच बार आरती होती
है। आम तौर पर मंदिरों में सुबह शाम को ही आरती होती है। मंदिर में साक्षात ज्योति, जो कि अनादिकाल से यहां विराजमान है उसकी पूजा होती है। चट्टान में जल रही ज्योति अपने आप जलती हैं।
इसे कोई जलाता नहीं है। यह जल कैसे रही हैं। अनसुलझी पहेली है। इसे देखने वाला
हैरान रह जाता है। रोचक तथ्य यह है कि आज तक कई बार इन ज्योतियों की ताकत के
परीक्षण हुये। मुगल सम्राट अकबर ने मां ज्वालादेवी की परीक्षा के लिए ज्योतियों को
बुझाने के लिये यहां पर पानी डलवाया, लेकिन ज्योतियां ज्यों की त्यों
प्रज्जवल्लित रहीं।
ज्वालामुखी शक्तिपीठ के पीछे एक कथा भी
है
बहुत समय पहले की बात है कसेटी गांव
प्रेम सिंह नाम का एक किसान था उसके पास बहुत खेत थे वो अपने खेतो में बहुत ही
मेहनत से काम करता था | उस के दो बेटे थे । बड़े बेटे का नाम वीर सिंह और छोटे बेटे का नाम दूलो
राम सिंह है | प्रेम सिंह पास बहुत सारे जानवर भी थे, प्रेम सिंह को अपने जानवरों से बहुत प्यार था इसलिए उसने अपने घर में बहुत
सारी गाय और भैंस पाल रखी थीं। वो अपने खेत में और दूध बेचकर वह अपना जीवन व्यतीत
करता था । प्रेम सिंह के घर से नेकेड खड्ड 2 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है | हर रोज वो अपनी गाय और भैंस चराने के लिए नेकेड खड्ड ले जाया करते थे
कहा जाता है कि नेकेड खड्ड के किनारे एक
बड़ी चट्टान के ऊपर एक पत्थर था और प्रेम सिंह की गाय हर रोज सुबह और शाम जाकर इस
पत्थर पर दूध चढाती थी और जब गाय दूध चढाती थी तो उसके चारों ओर धुंध - सी छा जाती
थी, एक दिन गाय को कुछ लोगो ने ऎसा करते देख लिया और वे लोग इस पत्थर के पास गए, वहाँ जाकर देखा की वो पत्थर नहीं है वो तो एक शिवलिंग है | और लोगों ने आपस मे एक - दूसरे से बातचीत करके ये निर्णय लिया क्यों ना इस
शिवलिंग को अपने गाँव ले लिया जाये, सभी लोगो ने माथा टेका और वो लोगो उस
शिवलिंग को अपने गांव (मानगढ़) में ले की तैयारी करने लगे | उन लोगो ने एक पालकी तैयार की ओर शिवलिंग को ले जाने लगे, जैसे-जैसे उन लोगों ने 2 किलोमीटर की दूरी तय कर ली फिर जैसे-2 अपना कदम
बढ़ाने लगे तो शिवलिंग का भार बढ़ने लगा, भार ना संभालने के
कारण लोगो ने शिवलिंग को भूमि पर रख दिया और विश्राम करने लगे | विश्राम करने के बाद वो लोग शिवलिंग को उठाने का काफी प्रयास करते रहे, लेकिन असफल रहे । तभी उनका एक रूप यहां प्रकट हुआ, इस बाद में इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया गया । तब से लेकर आज तक
होली के 5 दिन पहले प्रेम सिंह अपने घर सभी गाँव के लोगो को निमंत्रण दे कर भोजन
करवाते थे । प्रेम सिंह की मृत्यु होने के बाद अब ये रीत उनके दोनों बेटे निभाते आ
रहे है
यही नहीं पिछले 50 से अधिक सालों से यहां आसपास की पहाड़ियों में तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम
ने कई परीक्षण किये। उन्हें भी नाकामी ही मिली। विश्व में शायद यही ऐसा मंदिर है, जहां प्रतिमा की पूजा नहीं होती । जल रही ज्योति ही शक्ति का साक्षात्
स्वरूप है ।
मंदिर की वास्तुकला
मंदिर में प्रवेश हेतु मुख्य द्वार तक
संगमरमर की सीढ़ियाँ हैं, तब द्वार है। अंदर एक अहाता है, जहाँ एक पुल से जाया जाता है। अहाते के
बीच में एक मंदिर है। उसके अगल-बगल देवी के धार्मिक कक्ष के रूप में अनेक भवन हैं।
ज्वालाओं का कुण्ड मध्य में है। ज्वालादेवी मंदिर के पीछे भी एक छोटा-सा मंदिर है, जिसमें एक कुआँ है। उसकी दीवार से भी प्रकाश ज्योति फूटती रहती है। मंदिर
के सामने एक जल कुण्ड भी है, जिसमें से जल लेकर भक्तगण स्नान करके
दर्शन करते हैं।
इस मंदिर का वास्तुशिल्प अनूठा है।
निर्माण में तराशे गए बड़े-बड़े शिलाओं का प्रयोग हुआ है। सन् 1905 में भूकंप आया, जिसने काँगड़ा घाटी को हिला दिया। अनेक भवन तथा मंदिर धराशायी हो गए, किंतु इस मंदिर को रंचमात्र नुकसान नहीं पहुँचा। कहते हैं कि अकबर ने जब
यहाँ के बारे में सुना, तो उसे माँ की शक्ति पर अविश्वास हुआ। उसने ज्योति बुझाने की असफल कुचेष्टा
की। ज्योति के ऊपर लोहे की मोटी चादर तक रखवा दी, पर ज्वाला चादर फाड़कर निकलती रही। उसने उधर जल का रुख़ कराया, पर ज्योति नहीं बुझी। तब उसे शक्ति पर विश्वास हो गया। उसने सवा मन का
स्वर्ण छत्र कंधे पर रखा तथा नंगे पाँव मंदिर तक पहुँचा। ज्यों ही उसने छत्र
चढ़ाना चाहा, वह छत्र किसी अज्ञात धातु का हो गया। अकबर ने अपने गुनाह की माफी माँगी और
दिल्ली लौट गया।
आकर्षण का केन्द्र
मंदिर में पांच बार होती है आरती
मंदिर की एक और रोचक बात यह है कि यहां
पांच बार आरती होती है। सुबह ब्रह्ममुहूर्त में पहली आरती होती है। जिसमें मालपुआ, खोआ, मिस्री का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इसे मंगल आरती कहते हैं। दूसरी आरती पहली आरती से एक घंटा बाद होती है।
इसमें पीले चावल व दही का भोग लगाया जाता है। तीसरी आरती दोपहर के समय की जाती है।
इसमें चावल छह मिश्रित दालों व मिठाई का भोग लगाया जाता है। चौथी आरती सांयकाल में
की जाती है। इसमें पूरी चना और हल्वा का भोग लगता है। रात करीब नौ बजे शयन आरती होती है। जिसमें माता
के शयनकक्ष में सौंदर्यलहरी के मधुर गान
के बीच सोलह सिंगार करने के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिये जाते हैं।
कैसे पहुंचे
यहां पहुंचना बेहद आसान है। यह जगह वायु
मार्ग, सड़क मार्ग और रेल मार्ग से अच्छी तरह जुड़ी हुई है।
वायु मार्ग
ज्वालाजी मंदिर जाने के लिए नजदीकी हवाई
अड्डा गगल में है, जो कि ज्वालाजी से 46 किमी की दूरी पर स्थित है। यहां से
मंदिर तक जाने के लिए कार व बस सुविधा उपलब्ध है।
रेल मार्ग
रेल मार्ग से जाने वाले यात्री पठानकोट
से चलने वाली स्पेशल ट्रेन की सहायता से मरांदा होते हुए पालमपुर आ सकते है।
पालमपुर से मंदिर तक जाने के लिए बस व कार सुविधा उपलब्ध है।
सड़क मार्ग
पठानकोट, दिल्ली, शिमला आदि प्रमुख शहरों से ज्वालामुखी मंदिर तक जाने के लिए बस व कार
सुविधा उपलब्ध है। यात्री अपने निजी वाहनों व हिमाचल प्रदेश टूरिज्म विभाग की बस
के द्वारा भी वहां तक पहुंच सकते हैं। दिल्ली से ज्वालाजी के लिए दिल्ली परिवहन
निगम की सीधी बस सुविधा भी उपलब्ध है।
लोकेशन- हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा में स्थित है
मंदिर का समय- सुबह 5 बजे से रात 10:00 बजे तक
मंदिर दर्शन का सही समय- अगस्त से मार्च के बीच में
प्रमुख त्यौहार
यहां हर साल होली, महाशिवरात्रि, होली ,जन्माष्टमी ,नवरात्रि और सावन
आदि में भोले के भक्तों की भारी भीड उमड पडती है । जय बाबा धुंन्धेशवर महादेव में
महाशिवरात्रि के समय में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। साल के दोनों नवरात्रि
यहां पर बडे़ धूमधाम से मनाये जाते है। महाशिवरात्रि में यहां पर आने वाले
श्रद्धालुओं की संख्या दोगुनी हो जाती है । इन दिनों में यहां पर विशेष पूजा
अर्चना की जाती है। शिव चालीसा का पाठ रखे जाते हैं और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ
हवन इत्यादि की जाती है। महाशिवरात्रि और होली में पूरे भारत वर्ष से श्रद्धालु
यहां पर आकर देव की कृपा प्राप्त करते है । कुछ लोग देव के लिए लाल रंग के ध्वज भी
लाते है ।
निकतम रेलवे स्टेशन – ज्वालामुखी रोड
निकतम हवाई अड्डा – गगल







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