Baba Baidyanath Dham Jyotirlinga ||
झारखंड के देवघर में स्थित
वैद्यनाथ मन्दिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। एक पवित्र तीर्थ की
मान्यता प्राप्त होने के कारण भक्त इसे वैद्यनाथ धाम भी कहते हैं। इसके महातम्य का
अंदाज इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जहां ये मन्दिर स्थित है उस स्थान नाम ही
देवघर यानि देवताओं का घर पड़ गया। बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को सिद्धपीठ माना जाता
है क्योंकि श्रद्घालुओ का विश्वास है कि यहां पूजा और दशर्न से समस्त मनोकामनायें
पूर्ण हो जाती हैं। इसलिए इस लिंग को कामना लिंग भी कहते हैं। मंदिर के
मध्य प्रांगण में शिव का भव्य 72 फीट ऊंचे मंदिर के अलावा प्रांगण में अन्य 22
मंदिर स्थापित हैं। मंदिर प्रांगण में एक घंटा, एक चंद्रकूप और विशाल सिंह
दरवाजा बना हुआ है।
वैद्यनाथ धाम से जुड़ी कथा
इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के अनुसार एक बार रावण ने
शिवजी को प्रसन्न करने के लिये घोर तपस्या की और अपने सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ाने
लगा। जब उसने अपने नौ सिर चढ़ा दिए और दसवां काटने लगा तो शिवजी प्रकट हो गये।
उन्होंने उसके दसों सिर वापस उसके धड़ पर स्थापित कर दिए और वर मांगने के लिए कहा।
तब रावण ने कहा कि आप मेरे साथ लंका चलिए और वहां निवास करिए। शिव ने उसकी बात
मानली पर एक शर्त रख दी कि कैलाश से लंका तक रावण उन्हें उठा कर ले जायेगा और
मार्ग में कहीं रखेगा नहीं। यदि उसने ऐसा किया तो वे उसी स्थान पर स्थापित हो
जायेंगे। शर्त मान कर रावण उन्हें लेकर चला पर रास्ते में उसे लघुशंका जाने की
आवश्यकता महसूस हुई तो उसने वैद्यनाथ नाम के व्यक्ति को शिवलिंग संभलवा दिया और चला
गया। उस व्यक्ति से वो बोझ नहीं संभला तो उसने शिवलिंग जमीन पर रख दिया और शिव जी
वहीं स्थापित हो गए। रावण ने बहुत प्रयास किया उन्हें उठाने का पर सफल ना हो सका और
निराश हो कर लौट गया। तब से शिव जी यहां स्थापित हैं।
कुछ लोगों की मान्यता है कि इस
मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा जी ने करवाया है। पंडित कामेश्वर मिश्र
के मुताबिक पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि रावण द्वारा शिवलिंग के रखे जाने और उसे
चले जाने के बाद भगवान विष्णु स्वयं इस शिवलिंग के दर्शन के लिए पधारे थे। तब
भगवान विष्णु ने शिव की षोडशपचार पूजा की थी तब शिव ने विष्णु से यहां एक मंदिर
निर्माण की बात कही थी। इसके बाद विष्णु के आदेश पर भगवान विश्वकर्मा ने आकर इस
मंदिर का निर्माण किया था। बाबा वैद्यनाथ को आत्मलिंग, मधेश्वर, कामनालिंग, रावणेश्वर, श्री वैद्यनाथ, मर्ग आदि नामों से भी जाना जाता है।
जनश्रुतियों से जुड़ी कथा
जनश्रुतियों के मुताबिक
अंग्रेजों के समय में जेल के एक जेलर का पुत्र दक्षिण अफ्रीका गया था और वह लापता
हो गया था। उसे खोजने के काफी प्रयास किए गए, लेकिन सफलता नहीं मिली। जेलर ने
तब स्थानीय लोगों के कहे अनुसार बाबा के मंदिर में जाकर पूजा-पाठ की और पुष्प से
श्रृंगार किया। इसके बाद चमत्कार हो गया और उसका खोया पुत्र वापस चला आया। इसके
बाद यहां से प्रतिदिन मंदिर में पुष्प जाने लगा।
जेल में
इसके लिए एक बाबा वार्ड है, जहां
कैदी पूरी शुद्धता से मुकुट का निर्माण करते हैं। जेल के सिपाही शहर के बागों से
प्रतिदिन फूल लाकर इन कैदियों को देते हैं। सात वर्ष से मुकुट बना रहे कैदी अशोक
का कहना है कि चार बजे तक मुकुट बना लिया जाता है, फिर इसे कंधे पर रखकर मंदिर तक
पहुंचाया जाता है।
श्रृंगार पूजा
इस मंदिर में प्राचीनकाल से चली
आ रही श्रृंगार पूजा का अपना अलग महत्व है। इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता है कि
बाबा के श्रृंगार के लिए मुकुट जेल के कैदियों द्वारा तैयार किया जाता है।
बाबा
बैद्यनाथ के प्रतिदिन होने वाले संध्या श्रृंगार पूजा का विशिष्ट महत्व है।
शिवलिंग को आकर्षक ढंग से सजाया जाता है। श्रृंगार करते समय मंदिर में बाहरी लोगों
का प्रवेश वर्जित कर दिया जता है। इस श्रृंगार पूजा में देवघर जेल के कैदियों
द्वारा बनाए गए नाग पुष्प मुकुट से बाबा को सजाया जाता है।
यहां
वर्षभर शिवभक्तों की भारी भीड़ लगी रहती है, लेकिन
सावन महीने में यह पूरा क्षेत्र केसरिया वस्त्र पहने शिवभक्तों से पट जाता है। सावन
के महीने में वैद्यनाथ धाम के आसपास मेला लगता है। यहां कांवड़िये बोल-बम, बोल-बम
का जयकारा लगाते हुए बाबा भोलेनाथ के दर्शन करने आते है। वे सुल्तानगंज से पवित्र
गंगा का जल लेकर लगभग सौ किलोमीटर की अत्यन्त कठिन पैदल यात्रा कर के भगवान शिव को
चढ़ाने के लिए जल लाते हैं। बैद्यनाथ धाम की ये कांवड़ यात्रा सावन मास यानि
जुलाई-अगस्त के महीनों में शुरु होती है। सबसे पहले तीर्थ यात्री सुल्तानगंज में
एकत्र होते हैं जहां वे अपनी कांवड़ में पवित्र गंगाजल भरते हैं। इसके बाद वे
कांवड़ लेकर बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ की ओर बढ़ते हैं। इस जल को लेकर जाते समय
ध्यान रखा जाता है कि वह जल का पात्र कहीं भी भूमि से न छू पाये।
कैसे
पहुंचे
देवघर
एक प्रमुख तीर्थ स्थान है, यह झारखण्ड राज्य के संथाल परगना के अंतर्गत
है। इस शहर में बैधनाथ मंदिर स्थित है जो
की बारह शिव ज्योतिर्लिंग में से एक है इस ज्योतिर्लिंग को मनोकामना लिंग भी कहा जाता
है। देवघर में प्रयटको के लिए बहुत से आकर्षण केंद्र है : नौलखा मंदिर , बासुकीनाथ , बैजू मंदिर और माँ शीतला मंदिर है।
देवघर हवाई, सड़क
और रेल द्वारा देश के अन्य प्रमुख शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
हवाई मार्ग द्वारा देवघर तक कैसे पहुंचे
निकटतम
घरेलू हवाई अड्डा लोक नायक जयप्रकाश हवाई अड्डे, पटना, देवघर से 274 किलोमीटर दूर स्थित है।
पटना में बैंगलोर, चेन्नई,
दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई, रांची, भोपाल, अहमदाबाद, गोवा और विशाखापत्तनम जैसे कई शहरों की
दैनिक उड़ानें हैं।
रेल
द्वारा देवघर तक कैसे पहुंचे
रेलवे
स्टेशन देवघर से 7 कि.मी. की दूरी पर बैद्यनाथ धाम में स्थित है और यह नई दिल्ली,
मुंबई, कोलकाता, वाराणसी और भुवनेश्वर जैसे कई बड़े
शहरों से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। यहाँ का मुख्य स्टेशन जसीडीह है जो की देवघर
से 7 किलोमीटर की दूरी पर है।
रोड
से देवघर तक कैसे पहुंचे
देवघर सारवा से 16 किलोमीटर, सारठ से 36 किलोमीटर, जरमुंडी से 41 किलोमीटर, चंदमारी से 52 किलोमीटर, 132 किलोमीटर से धनबाद, 148 किलोमीटर से कोडरमा, 278 किलोमीटर दूर है। झारखंड राज्य सड़क परिवहन निगम लिमिटेड, पश्चिम बंगाल राज्य सड़क परिवहन निगम लिमिटेड और कुछ निजी यात्रा सेवाओं के माध्यम से जुड़ा हुआ है।

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