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Shri Omkareshwar Jyotirlinga || ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग

 

 Shri Omkareshwar Jyotirlinga || ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग



भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंग में चौथा ओम्कारेश्वर है. ओमकार का उच्चारण सर्वप्रथम स्रष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से हुआ था. वेद पाठ का प्रारंभ भी ॐ के बिना नहीं होता है. उसी ओमकार स्वरुप ज्योतिर्लिंग श्री ओम्कारेश्वर है, अर्थात यहाँ भगवान शिव ओम्कार स्वरुप में प्रकट हुए हैं. ज्योतिर्लिंग वे स्थान कहलाते हैं जहाँ पर भगवान शिव स्वयम प्रकट हुए थे एवं ज्योति रूप में स्थापित हैं. प्रणव ओम्कारेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन से समस्त पाप भस्म हो जाते है.  

मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी के तट पर इंदौर से ७७ किमी एवं मोरटक्का से १३ किमी की दुरी पर भगवान शिव का ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थित है. यहाँ पर नर्मदा नदी दो भागों में बंट कर मान्धाता या शिवपूरी नामक द्वीप का निर्माण करती है यह द्वीप या टापू करीब ४ किमी लंबा एवं २ किमी चौड़ा है. इस द्वीप का आकार ओम् अथवा ओमकार के द्रश्य प्रतिरूप समान है.    

       पुराणों में स्कन्द पुराण, शिवपुराण व वायुपुराण में ओम्कारेश्वर क्षेत्र की महिमा उल्लेख है. ओम्कारेश्वर में कुल ६८ तीर्थ है. यहाँ ३३ कोटि देवता विराजमान है. दिव्य रूप में यहाँ पर १०८ प्रभावशाली शिवलिंग है. ८४ योजन का विस्तार करने वाली माँ नर्मदा का विराट स्वरुप है श्री ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रमुख शहर इंदौर से ७७ किमी की दुरी पर है. एवं यह ऐसा एकमात्र ज्योतिर्लिंग है जो नर्मदा के उत्तर तट पर स्थित है. भगवान शिव प्रतिदिन तीनो लोकों में भ्रमण के पश्चात यहाँ आकर विश्राम करते हैं. अतएव यहाँ प्रतिदिन भगवान शिव की विशेष शयन व्यवस्था एवं आरती की जाती है तथा शयन दर्शन होते हैं.

       पुराणों के अनुसार विन्ध्य पर्वत ने भगवान शिव की पार्थिव लिंग रूप में पूजन व तपस्या की थी एवं भगवान शिव ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया एवं प्रणव लिंग के रूप में अवतरित हुए .यह भी कहा जाता है की देवताओं की प्रार्थना के पश्चात शिवलिंग २ भागो में विभक्त हो गया एवं एक भाग ओम्कारेश्वर एवं दूसरा भाग ममलेश्वर कहलाया. ऐसा कहा जाता है की ज्योति लिंग ओंकारेश्वर में एवं पार्थिव लिंग अमरेश्वर/मम्लेश्वर में स्थित है. अन्य कथानुसार इक्ष्वाकु वंश के राजा मान्धाता ने यहाँ कठोर तपस्या की तब भगवान शिव ने उन्हें आशीर्वाद दिया एवं यहाँ प्रकट हुए, तभी से भगवान ओंकारेश्वर में रूप में विराजमान हैं.

मंदिर वास्तुकला

ओंकारेश्वर का मुख्य मंदिर ऊँचे शिखर से युक्त उत्तरभारतीय वास्तुकला से बना है.यह मंदिर दर्शनार्थियों का प्रमुख आकर्षण है. मंदिर के निर्माण के विषय में कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है. इसे किसने बनवाया और कब यह अज्ञात है. मंदिर का गर्भ गृह मूलतः पुरानी निर्माण शैली में बने एक छोटे मंदिर के सामान लगता है इसका गुम्बद पत्थर की परतों को जमा कर बनाया गया है. चूँकि यह छोटा मंदिर ऊंचाई पर नदी के सीधे गहरे किनारे के काफी पास दक्षिण की ओर बना है एवं उत्तर की और का बड़ा विस्तृत हिस्सा नई निर्माण शैली में बना लगता है संभवतः इसी वजह से गर्भ गृह एवं मुख्य देवता न तो मुख्य द्वार के सीधे सामने है न ही नए निर्माण के शिखर के ठीक नीचे स्थित हैं.

मंदिर में एक विशाल सभा मंडप है जो की लगभग १४ फुट ऊँचा है एवं ६० विशालकाय खम्बों पर आधारित है.मंदिर कुल मिला कर ५ मजिलों वाला है एवं सभी पर अलग अलग देवता स्थापित हैं. जो की नीचे से ऊपर की ओर क्रमश: श्री ओंकारेश्वर , श्री महाकालेश्वर, श्री सिद्धनाथ , श्री गुप्तेश्वर, एवं ध्वजाधारी शिखर देवता हैं.

पूजन और पालकी

मंदिर में नियमित रूप से प्रतिदिन ३ पूजा की जाती हैं प्रातःकालीन पूजा ट्रस्ट द्वारा , दोपहर की पूजा सिंधिया घराने के पुजारी द्वारा एवं सायंकालीन पूजा होलकर स्टेट के पुजारी द्वारा की जाती है. मंदिर में हमेशा भक्तों की भीड़ रहती है जो नर्मदा में स्नान कर नर्मदा जल से भरे पात्र, पुष्प, नारियल एवं अन्य सामग्री लेकर भगवान का पूजन करते हैं.कई भक्त पुरोहित के साथ भगवान का विशेष पूजन एवं अभिषेक भी करते हैं. पर्व काल एवं मेलों के दौरान भारी भीड़ होती है.

प्रत्येक सोमवार को भगवान ओंकारेश्वर  की तीन मुखों वाली स्वर्णखचित मूर्ति एक सुन्दर पालकी में विराजित कर ढोल नगाडो के साथ पुजारियों एवं भक्तो द्वारा जुलुस निकाला जाता है जिसे डोला या पालकी कहते हैं इस दौरान सर्वप्रथम नदी तट पर जाते हैं एवं पूजन अर्चन किया जाता है तत्पश्चात नगर के विभिन्न भागों में भ्रमण किया जाता है यह जुलुस सोमवार सवारी के नाम से जाना जाता है. पवित्र श्रावण मास में में यह बड़े पैमाने पर मनाया जाता है एवं भारी मात्रा में भक्त नृत्य करते हुए एवं गुलाल उड़ाते हुए ओम् शम्भू भोले नाथ का उद्घोष करते हैं यह बड़ा ही सुन्दर द्रश्य होता है

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग के निकट अन्य दर्शनीय मंदिर



ममलेश्वर मंदिर

ममलेश्वर मंदिर नर्मदा के दक्षिण तट पर स्थित है इसका सही नाम अमरेश्वर है. भक्तगण ओंकारेश्वर एवं ममलेश्वर दोनों जगह दर्शन पूजन करते हैं. यह मंदिर प्राचीन वास्तु कला एवं शिल्पकला का अद्वितीय नमूना है. मंदिर की दीवारों पर विभिन्न महिम्न स्त्रोत उकेरे गए हैं जो की १०६३ इस्वी के बताये जाते हैं. महारानी अहिल्या बाई होलकर इस मंदिर में पूजन अर्चन किया करती थीं एवं तभी से आज तक होलकर स्टेट के पुजारी यहाँ पूजन करते हैं. मंदिर का प्रबंधन अहिल्याबाई खासगी ट्रस्टद्वारा किया जाता है. यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा घोषित संरक्षित स्मारक है.



पंचमुखी गणेश मंदिर

सभी देवों में भगवान गणेश प्रथम पूज्य माने जाते हैं. ओंकारेश्वर में मुख्य मंदिर के पहले पंचमुखी गणेश मंदिर स्थित है. यहाँ गणेश जी की प्रतिमा स्वयंभू मानी जाती है. यह उसी पाषाण में उत्पन्न हुई है जिसमे श्री ओंकारेश्वर प्रकट हुए है. मूर्ति में २ मुख दायें २ मुख बाएं एवं १ सामने की ओर है. भक्त श्री ओंकारेश्वर से पहले यहाँ दर्शन करते हैं. भादों मॉस की चतुर्थी को यहाँ यज्ञ का आयोजन किया जाता है



बृहदेश्वर मंदिर

यह मंदिर ममलेश्वर मंदिर के समीप स्थित है .मंदिर में अत्यंत ही सुन्दर शिल्पकारी एवं नक्काशी की गयी है एवं यह मंदिर अत्यंत ही दर्शनीय है. वर्तमान में यहाँ २४ अवतारों की मूर्तियां स्थापित है.



श्री गोविन्देश्वर मंदिर और गुफा

यह मंदिर ओंकारेश्वर मंदिर के प्रवेशद्वार के पास ही स्थित है. यह एक सर्वमान्य तथ्य है की जगद्गुरु शंकराचार्य ने दीक्षा एवं योग लेख शिक्षा अपने गुरु गोविन्द भाग्वदपाद द्वारा ओंकारेश्वर  में ही ग्रहण की थी. वह स्थान जहाँ जगद्गुरु शंकराचार्य ने दीक्षा ग्रहण की थी श्री गोविन्देश्वर मंदिर कहलाता है एवं जहाँ गुरु गोविन्द भाग्वदपाद निवास करते थे तथा तप किया करते थे वह स्थान गोविन्देश्वर गुफा कहलाता है. इस मंदिर का जीर्णोद्धार सन १९८९ में जगद्गुरु जयेन्द्र सरस्वती द्वारा करवाया गया था एवं निर्माण कार्य का शिलान्यास तत्कालीन राष्ट्रपति श्री आर वेंकटरमण ने किया था.



अन्नपूर्ण मंदिर

यह एक प्राचीन मंदिर है जिसमे एक विशाल परिसर निर्मित किया गया है. इस परिसर में सर्वमंगला मंदिर भी स्थित है जिसमे देवी लक्ष्मी, सरस्वती एवं पार्वती की मूर्ति स्थापित है. यहाँ एक ३५ फुट ऊँची भगवान कृष्ण की विराट स्वरूप मूर्ति स्थापित है. भगवान कृष्ण के विराट स्वरुप का वर्णन श्रीमद भगवतगीता में किया गया है.



श्री महाकालेश्वर मंदिर

ओंकारेश्वर में मंदिर के नीचे से दूसरे तल पर श्री महाकालेश्वर मंदिर भी स्थित है जैसा की उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर ज्योतिर्लिंग में श्री ओंकारेश्वर मंदिर भी स्थित है. यहाँ श्री महाकाल ऊपर एवं श्री ओमकार नीचे हैं एवं इसके उलट उज्जैन में श्री ओमकार ऊपर एवं महाकाल नीचे हैं. यहाँ श्री महाकालेश्वर मंदिर में भक्तगण श्रद्धाभाव से पूजन अर्चन करते हैं एवं इनका दर्शन भी सम्पूर्ण ओंकारेश्वर दर्शन में आवश्यक माना जाता है.



गुरुद्वारा ओंकारेश्वर साहिब

श्री गुरुनानक देव जी महाराज अपनी देशव्यापी धार्मिक यात्रा के दौरान ओंकारेश्वर आये थे. इसी घटना की स्मृति में सिक्ख समाज द्वारा यहाँ पर एक गुरुद्वारा निर्मित किया गया है. हिंदू एवं सिक्ख समाज के धर्मावलंबी यहाँ श्रद्धाभाव से दर्शन करते हैं.

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